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ये फोटो तब की हैं जब दरबार साहिब पर हिन्दू महंतो का कब्जा था! महाराजा रणजीत सिघ की मौत 1839 के बाद ” खड़ग सिघ ” कुंवर नोनेहाल सिघ और काफी सिखों को जो पंजाब का राज्य क़ायम रखना चाहते थें उनकों ” गुलाब सिघ ” ध्यान सिघ ” जैसे हिन्दू डोंगरो ने मरवा दिया था आपसी गलत फहमी पैदा करके सिखों को आपस में लडवा दिया !फिर अंग्रेजों के साथ युद्ध हुए !जिसमें गद्दार डोंगरो ने अंग्रेजों का साथ दिया ” लाल सिघ ” तेजा सिघ जैसो ने अंग्रेजों के साथ मिलकर पंजाब को 1849 में गुलाम करवाया!यहाँ ये बात भी जिक्र योग्य हैं कि जिस डोंगरा और ब्राह्मनवादी लोगों ने धर्म के नाम पर 1857 का विवाद किया उन्ही बैल्टस ने #सिखों_के_खिलाफ भी अंग्रेजों का साथ दिया थाअंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा करते ही पहले ये बात को तरजीह दी कि सिखों को काबू में कैसे रखें अंग्रेजों को ये भी पता था कि सिख कभी भी संगठित होकर अपने खोए राज्य के लिए विद्रोह कर सकते हैं तो सबसे पहलें कुछ ख़ास बातों पर अमल किया गया! आखिरी सिख राजा दलीप सिघ को अंग्रेज ले गए ( छोटी आयु में) और उसको ईसाई धर्म की शिक्षा दी — सिखों को फ़ौज में नौकरी देनी बड़े पद देने शूरू किए! और सबसे अहम सिखों के गुरद्वारों को हिन्दू महंतो के हवाले किया गया!अंग्रेजों ने किसी मंदिर ” मसजिद पर कब्जा नहीं किया सिर्फ गुरु घरों पर कब्जा करवाया ! #मैकालिफ और #जान_लार्स लिखते हैं कि सिख क़ौम अपनें किसी भी मुद्दे के लिए गुरु घरों में इकठ्ठा होती हैं वहां हिन्दू महंतो को लगाना ठीक हैं क्योंकि सिखों की हर नीति की जानकारी #ब्रिटिश_सरकार को मिलती रहेगी ! यहीं हिन्दू महंतो ने गुरु घरों में हिन्दूवादी क्रम कांड शुरू कर दिए और दरबार साहिब में मूर्तीया रख दी !1875 में ब्राह्मन धर्म ” वेदों को बचाने के लिए दयानंद सरस्वती उर्फ मूल शंकर तिवारी नाम के ब्राह्मन ने बंबई में आर्य समाज की नींव रखी ! आर्य समाज ने हिन्दू धर्म की नये सिरे से कमान संभाली जिसके चलते कुछ सिख परिवार भी आर्य समाजी बने जैसे भगतसिंह का परिवार या दयाल सिंह मजीठिया आदि इसका सबसे ज्यादा प्रभाव महा पंजाब के कुछ इलाकों जिसे आज हरियाणा ‘ हिमाचल ‘ रोहतक आदि कहा जाता हैं वहां पड़ा वहां के हिन्दू जाट बहुल आर्य समाजी बने!दयानंद सरस्वती की इस लहर का मुकाबला करने और सिखों को सिखी के साथ जोड़ने गुरु के नियम बताने के लिए 1879 में लाहौर में सरदार गुरमुख सिघ की अगुवाई में #सिघ_सभा_लहर का निर्माण किया गया! सरदार गुरमुख सिघ के साथ सरदार दित सिघ (लाहौर कालज के पहलें अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर ) सरदार काहन सिघ नाभा ” जवाहर सिघ ” भाई वीर सिंघ आदि सिघ योद्धा मैदान मे आए धीरे-धीरे सिखों में इस लहर का असर दिखने लगा सिख क़ौम फ़िर से पूरी तरह अपने सिद्धांतों से जुड़ गयीफिर 1900 के बाद धीरे-धीरे गुरु घरों को आजाद करवाया गया — तब जाकर दरबार साहिब से मनुवादी देवी देवताओं की मुर्तिया निकाली और हिन्दू महंतो से गुरु घरों को आजाद करवाया जिन्होने गुरु घरों के सिद्धांतों को खराब किया था गुरु साहब की विचारधारा के विरुद्ध हिन्दू रीती रिवाजों को किया था! ननकाणा साहिब का साका ” चाभी मोर्चा ” गुरु का बाग मोर्चा सभी गुरु घरों को आजाद करवाया गया!बाद में दरबार साहिब के पास ही शमशान की जगह पर मदन मोहन मालवीय ” बिरला सेठ और आर्य समाजी लोगों ने मिलकर ” #दरबार_साहिब की नक़ल करके एक मंदिर का निर्माण करवाया जिसे #दुर्गियाना_मंदिर कहा जाता है उसी में वो मुर्तिया रखी गयी जो दरबार साहिब से निकाली थी ! गुरविंदर सिघ बागी!

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